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चंबा। हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के रेटा गांव की बेटी सीमा कुमारी ने गुरुवार को एशियन गेम्स के ट्रैक पर इतिहास रच दिया। जापान के आइची नागोया में महिलाओं की 10 हजार मीटर दौड़ में उड़न परी सीमा ने 32 मिनट 50.05 सेकेंड का समय लेकर कांस्य पदक जीता। आखिरी चक्कर तक पदक के लिए कड़ी जंग के बाद सीमा ने तीसरा स्थान हासिल किया। उनकी इस कामयाबी के साथ ही इस स्पर्धा में भारत का 16 साल का पदक का इंतजार खत्म हो गया। एशियन गेम्स में महिलाओं की 10 हजार मीटर दौड़ में भारत को इससे पहले 2010 में प्रिजा श्रीधरन ने स्वर्ण और कविता राउत ने रजत पदक दिलाया था। यह एशियन गेम्स के इतिहास में इस स्पर्धा में भारत का तीसरा पदक है। मौजूदा एशियन गेम्स के एथलेटिक्स में भारत का पहला पदक है। सीमा शुरुआत में आगे थी, लेकिन बीच में वह पीछे रह गईं। हालांकि, उन्होंने आखिरी चरण में वापसी कर मेडल अपने नाम किया।

Seema kumari Success Story: Once without shoes ran barefoot on rugged mountain paths
सीमा के संघर्ष में परिवार ने हमेशा उसका साथ दिया

 सीमा कुमारी का बचपन बेहद अभावों और आर्थिक तंगहाली में गुजरा है। जब वह महज 12 वर्ष की थीं, तब उनके पिता का साया सिर से उठ गया था। उनकी माता ने मजदूरी करके और मवेशी चराकर परिवार का पालन-पोषण किया। संसाधनों की कमी का आलम यह था कि शुरुआती दिनों में सीमा के पास दौड़ने के लिए जूते तक नहीं थे और वह पहाड़ी रास्तों पर नंगे पैर ही दौड़कर अभ्यास किया करती थीं। उनकी प्रतिभा को पहचान तब मिली जब उन्होंने स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (साई) हॉस्टल, धर्मशाला से अपना औपचारिक एथलेटिक्स प्रशिक्षण शुरू किया। इसके बाद उन्होंने भुवनेश्वर और भोपाल के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में भी उच्च स्तरीय ट्रेनिंग ली।

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मां ने एफडी तुड़वाकर बैंकॉक भेजा था

सीमा के संघर्ष में परिवार ने हमेशा उसका साथ दिया है। दस साल पहले मां केसरी देवी ने सीमा को बेहतर ट्रेनिंग दिलवाने के लिए बैंक में अपनी लाखों की एफडी तुड़वाकर बैंकॉक भेजा था। परिवार में उनकी मां केसरी देवी और तीन भाई राज कुमार, तेज सिंह और सुरेंद्र हैं। साल 2012 में जिस समय सीमा राष्ट्रीय स्कूली प्रतियोगिता के दौरान ट्रैक पर जीत के लिए दौड़ रही थीं, उस समय जिंदगी ने उन्हें सबसे बड़ा दुख दे दिया था। पिता बजीरू राम के निधन की खबर से अनजान सीमा ने पूरी ताकत से दौड़ लगा स्वर्ण पदक जीता था। प्रतियोगिता के दौरान परिवार और डीपीई ने सीमा को पिता के निधन की जानकारी नहीं दी थी, ताकि उनका प्रदर्शन प्रभावित न हो।

हर किसी की जुबां पर एक ही नाम था
वहीं, चुराह क्षेत्र के गांव रेटा में गुरुवार की शाम हर नजर जापान के आइची-नागोया में चल रहे एशियन गेम्स के ट्रैक पर टिकी थी। गांव की बेटी सीमा जब महिलाओं की 10 हजार मीटर दौड़ के फाइनल में उतरीं तो पैतृक गांव में जैसे वक्त थम गया। शाम 5 बजकर 55 मिनट पर शुरू हुई दौड़ के साथ ही परिजन और ग्रामीण टीवी के सामने जमा हो गए। हर किसी की जुबां पर एक ही नाम था – सीमा। सीमा की कामयाबी के लिए गांव में सुबह से ही पूजा-पाठ का दौर चला। परिवार के लोग रोजमर्रा के काम में जुटे रहे, लेकिन बातचीत का केंद्र सीमा ही रहीं। दौड़ शुरू हुई तो हर चक्कर के साथ गांव में उत्सुकता बढ़ती गई। आखिरी चक्कर तक पदक की जंग बनी रही और जैसे ही सीमा ने 32 मिनट 50.05 सेकेंड के समय के साथ कांस्य पदक पक्का किया, रेटा खुशी से झूम उठा।

एक दौड़ ने बदल दिया गांव का माहौल
जिस गांव में गुरुवार की सुबह सीमा की सफलता के लिए दुआएं मांगी जा रही थीं, वहीं शाम को उनकी उपलब्धि का जश्न मनाया गया। सीमा की जीत ने रेटा के हर घर में गर्व भर दिया। पहाड़ की कठिन राहों से निकलकर एशिया के सबसे बड़े खेल मंच तक पहुंची गांव की बेटी अब पूरे हिमाचल के लिए प्रेरणा बन गई है।

प्रमुख खेल उपलब्धियां और रिकॉर्ड
सीमा के नाम नेशनल यूथ एथलेटिक्स चैंपियनशिप सहित कई नेशनल रिकॉर्ड्स हैं। वर्ल्ड यूनिवर्सिटी गेम्स 2025 (जर्मनी) 5,000 मीटर में रजत पदक। इस वैश्विक प्रतियोगिता में 5,000 मीटर रेस में पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। टाटा स्टील कोलकाता मैराथन 2025 में 25,000 मीटर स्वर्ण पदक, इंटर-स्टेट सीनियर एथलेटिक्स चैंपियनशिप 2026 में 5,000 और 10,000 मीटर में दोहरे स्वर्ण पदक, भुवनेश्वर में शानदार प्रदर्शन कर एशियन गेम्स के लिए क्वालीफाई किया। राष्ट्रीय खेल 10,000 मीटर स्वर्ण पदक।

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