शिमला। कुत्ते के काटने से होने वाली मौत, अप्राकृतिक मौत होती है। लेकिन राज्य सरकार इसे नहीं मान रही। बीते दिसंबर में आयोग ने इस बारे में मप्र हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर राज्य सरकार को नोटिस जारी कर दिए हैं। यह बात मप्र मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष रिटायर्ड जस्टिस एनके जैन ने कही। इससे पहले चर्चा के दौरान अध्यक्ष जैन ने कहा कि सरकार सांप व अन्य जहरीले जीव के काटने से होने वाली मौत में मुआवजा दे सकती है तो फिर कुत्ते के काटने का हर्जाना देने में क्या परेशानी है। अध्यक्ष जैन आयोग के सदस्य रिटा. एडीजी सरबजीतसिंह के साथ अल्प प्रवास पर सागर अाए थे।
जेल में आत्महत्या का मुआवजा मिलना चाहिए : अध्यक्ष जैन ने कहा कि जेल या पुलिस अभिरक्षा में आत्महत्या के मामलों में प्रभावित परिवार को राज्य सरकार को मुआवजा देना चाहिए। इसके पीछे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस गाइडलाइन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकार के कैद में यदि व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु होती है तो उसके परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए। शासन को यह समझना चाहिए कि आपकी अभिरक्षा में हुई चूक के कारण ही संबंधित व्यक्ति ने मौत को गले लगाया। वैसे भी धारा 55(ए) में मानव की सुरक्षा व स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। उन्होंने बताया कि इस बारे में आयोग जिम्मेदार अधिकारियों के साथ एक मीटिंग कर चुका है।
कुत्ते के काटने से होने वाली मौत व शारीरिक क्षति को लेकर मानवाधिकार आयोग से पहले News Agency राज्य सरकार का ध्यानाकृष्ट करा चुका है। अगस्त 2019 में बुंदेलखंड में News Agency टीम की पड़ताल के अनुसार इस एरिया में रोजाना 200 नागरिक कुत्तों के काटने का शिकार हो रहे हैं। तब ये बात सामने आई थी कि स्थानीय निकाय कुत्तों की आबादी को रोकने में नाकाम साबित हो रहे हैं। वहीं राज्य सरकार अस्पतालों में एंटी-रेबीज के डोज उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हो रही है। कमोवेश यह हालात अभी भी जस के तस हैं। हाल ही में दमोह में एक मासूम को कुत्ते ने बुरी तरह से जख्मी कर दिया था। मप्र के आंकड़ोें की बात करें कि तो बीते चार साल में कुत्तों के काटने से 38 मौत हुई हैं जबकि 5.21 लाख से अधिक लोग घायल हुए।
उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उस गाइडलाइन का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि राज्य सरकार के कैद में यदि व्यक्ति की अप्राकृतिक मृत्यु होती है तो उसके परिवार को मुआवजा मिलना चाहिए। शासन को यह समझना चाहिए कि आपकी अभिरक्षा में हुई चूक के कारण ही संबंधित व्यक्ति ने मौत को गले लगाया। वैसे भी धारा 55(ए) में मानव की सुरक्षा व स्वास्थ्य की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। उन्होंने बताया कि इस बारे में आयोग जिम्मेदार अधिकारियों के साथ एक मीटिंग कर चुका है।
मानवाधिकार आयोग के नाम पर कुछ फर्जी संगठन सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने से लेकर अधिकारी-कर्मचारियों पर रौब झाड़ रहे हैं। इस बात को आयोग के अध्यक्ष जैन भी स्वीकार करते हैं। उन्होंने बताया कि मेरे संज्ञान में इस तरह कुछेक मामले आए। मैंने तत्काल संबंधित एसपी से ऐसे लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के लिए कहा। अध्यक्ष ने बताया कि मप्र में केवल मानवाधिकार आयोग है और उसके द्वारा जिला स्तर पर “मानवाधिकार मित्र’’ नियुक्त किए जाते हैं। अध्यक्ष जैन ने बताया कि मानवाधिकार के दायरे में केवल भौतिक संसाधन या मौलिक अधिकार नहीं हैं। आयोग, नागरिकों को शुद्ध पेयजल, ऑक्सीजन, आवास दिलाने के लिए भी जवाबदेह है। इस दिशा में हम लोग सरकार काे लगातार आगाह भी करते रहते हैं।
